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दिव्य महापुरूष थे ब्रह्मलीन स्वामी ऋषि केशवानंद महाराज-स्वामी भगवत स्वरूप

Bystaruknews

Jul 9, 2025

दिव्य महापुरूष थे ब्रह्मलीन स्वामी ऋषि केशवानंद महाराज-स्वामी भगवत स्वरूप
हरिद्वार, 9 जुलाई। गुरू पूर्णिमा पर्व के उपलक्ष्य में खड़खड़ी स्थित निर्धन निकेतन आश्रम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के समापन पर संत सम्मेलन का आयोजन किया गया। आश्रम के परमाध्यक्ष ऋषि रामकृष्ण महाराज के संयोजन में आयोजित संत सम्मेलन के दौरान सभी तेरह अखाड़ों के संत महापुरूषों ने ब्रह्मलीन स्वामी ऋषि केशवानंद महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर धर्म संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए श्रीमहंत विष्णुदास महाराज को पगड़ी पहनाकर सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी भगवत स्वरूप महाराज ने कहा कि सनातन धर्म संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए जीवन समर्पित करने वाले ब्रह्मलीन स्वामी ऋषि केशवानंद महाराज दिव्य महापुरूष थे। उनके शिष्य स्वामी ऋषि रामकृष्ण महाराज जिस प्रकार गुरू परंपरांओं को आगे बढाते हुए धर्म संस्कृति के उन्नयन के साथ शिक्षा क्षेत्र में योगदान कर रहे हैं। उससे सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए।
स्वामी ऋषि रामकृष्ण महाराज ने कहा कि वे सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें गुरू के रूप में ब्रह्मलीन स्वामी ऋषि केशवानंद महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ। पूज्य गुरूदेव से प्राप्त शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए उनके द्वारा स्थापित आश्रम की सेवा संस्कृति को आगे बढ़ाना ही उनके जीवन का उद्देश्य है।
महंत मोहन सिंह, स्वामी शिवानंद महाराज व स्वामी प्रांश ने फूलमाला पहनाकर सभी संतों का स्वागत किया और कहा कि गुरू के दिखाए मार्ग पर चलने से ही शिष्य के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे स्वामी हहिरानंद महाराज ने ब्रह्मलीन स्वामी केशवानंद महाराज को नमन करते हुए कहा कि सद्गुरू ही शिष्य के जीवन में ज्ञान का प्रकाश कर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं।
इस अवसर पर स्वामी शिवानंद, महंत रघुवीर दास, महंत मोहन सिंह, महंत तीरथ सिंह, महंत ज्ञानानंद, महंत विष्णुदास, डा.हरिगोपाल, स्वामी सूरज दास, महंत श्यामप्रकाश, संत जगजीत सिंह, स्वामी रविदेव शास्त्री, स्वामी दिनेश दास, स्वामी ज्योर्तिमयानंद, महंत विनोद महाराज, डा.प्रोफेसर दिनेश शास्त्री, स्वामी राजेंद्रानंद, स्वामी शिवानंद भारती, महंत प्रमोद दास, महंत प्रेमदास सहित सभी तेरह अखाड़ों के संत महापुरूष व श्रद्धालु भक्त मौजूद रहे।

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